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ईरान का तीखा बयान – आने दो, जिंदा नहीं छोड़ेंगे; अमेरिका अब भी चुप, क्या हालात बदल गए?

होर्मुज संकट के बीच ईरान का रुख और सख्त होता जा रहा है, जबकि अमेरिका चुप्पी साधे हुए है। इस बीच अमेरिकी सेना तेजी से मिडिल ईस्ट की ओर बढ़ रही है। ईरानी नेता बार-बार कड़ी चेतावनी दे रहे हैं, लेकिन हालात कुछ अलग संकेत दे रहे हैं। क्या अब ईरान में ग्राउंड ऑपरेशन का समय आ गया है?

जिस समय पाकिस्तान में ईरान को लेकर चार देशों के बीच बातचीत चल रही थी, ठीक उसी दौरान ऐसे बयान सामने आने लगे जिनसे अटकलें तेज हो गईं। सवाल उठ रहा है कि क्या मिडिल ईस्ट में हवाई हमलों के बाद अब जमीन पर भी जंग की शुरुआत होने वाली है? क्या अमेरिका अपने सैनिकों के साथ ईरान की धरती पर कदम रखने की तैयारी में है?

ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने खुलकर वॉशिंगटन को चुनौती देते हुए कहा कि ईरानी सेना अमेरिकी ग्राउंड ट्रूप्स का इंतजार कर रही है—‘आने दो, हम पूरी तरह तैयार हैं।’ हालांकि इस तरह की सख्त चेतावनियों के बावजूद अमेरिका की ओर से असामान्य खामोशी बनी हुई है। कोई भी साफ तौर पर यह नहीं कह रहा कि क्या अमेरिकी फौज वास्तव में ईरान में प्रवेश करने वाली है। लेकिन समुद्र में तैनात अमेरिकी युद्धपोत और उन पर मौजूद हजारों मरीन कमांडो इशारा कर रहे हैं कि हालात सतह पर जितने शांत दिख रहे हैं, अंदर ही अंदर उतने ही गंभीर होते जा रहे हैं।

अमेरिका तेजी से मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है। एशिया से 31वीं और 11वीं मरीन एक्सपीडिशनरी यूनिट्स—जो समुद्री हमलों में माहिर मानी जाती हैं—को बड़े नेवी जहाजों के जरिए इलाके की ओर भेजा जा चुका है। इसके अलावा 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के करीब 2,000 सैनिकों को भी हाई अलर्ट पर रखा गया है। इनकी खासियत यह है कि आदेश मिलते ही महज 18 घंटे के भीतर दुनिया के किसी भी हिस्से में पहुंचकर रणनीतिक ठिकानों, जैसे एयरपोर्ट या सैन्य अड्डों पर कब्जा कर सकते हैं।

खबरें हैं कि अमेरिका करीब 10,000 और सैनिकों को भेजने की तैयारी में है। इस आंकड़े को सुनकर लग सकता है कि अमेरिका इराक या अफगानिस्तान जैसी बड़ी सैन्य कार्रवाई की ओर बढ़ रहा है। लेकिन जरा ठहरकर सोचिए। इराक पर हमले के दौरान अमेरिका ने डेढ़ लाख से ज्यादा सैनिक तैनात किए थे। ऐसे में सिर्फ 10,000 जवानों के दम पर ईरान जैसे बड़े और मजबूत देश पर पूरी तरह कब्जा करना संभव नहीं माना जाता।

तो सवाल उठता है कि आखिर इन सैनिकों को क्यों भेजा जा रहा है? दरअसल, इनका मकसद कब्जा करना नहीं, बल्कि सर्जिकल स्ट्राइक जैसे छोटे लेकिन बेहद घातक जमीनी ऑपरेशन अंजाम देना हो सकता है। ये खास तौर पर प्रशिक्षित कमांडो होते हैं, जो अचानक तटीय या रणनीतिक इलाकों पर हमला करते हैं, अपने मिशन को तेजी से पूरा करते हैं और फिर तुरंत वहां से निकल जाते हैं।

तीन बेहद खतरनाक ऑपरेशन

  1. सबसे अहम निशाना खार्ग आइलैंड माना जा रहा है। ईरान के तट के पास स्थित यह करीब 9 वर्ग मील का छोटा सा द्वीप है, लेकिन इसकी रणनीतिक अहमियत बेहद बड़ी है। ईरान का 90% से ज्यादा कच्चा तेल इसी द्वीप के जरिए दुनिया के बाजारों तक पहुंचता है। ऐसे में अगर अमेरिका इस पर कब्जा कर लेता है या इसे नुकसान पहुंचाता है, तो ईरान की अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लग सकता है। बताया जाता है कि Donald Trump भी 1980 के दशक से इस द्वीप को निशाना बनाने की बात करते रहे हैं।
  2. इसके अलावा होर्मुज क्षेत्र में स्थित केशम (Qeshm) और लारख (Larak) जैसे द्वीप भी संभावित निशाने पर माने जा रहे हैं। होर्मुज वह अहम समुद्री रास्ता है, जहां से दुनिया के करीब 20% तेल की आपूर्ति गुजरती है। ईरान अक्सर इस मार्ग को बंद करने की चेतावनी देता रहा है। ऐसे में माना जा रहा है कि अमेरिका इन द्वीपों पर नियंत्रण स्थापित कर ईरान के हथियार भंडार, ड्रोन नेटवर्क और समुद्री माइंस के जाल को खत्म करना चाहता है।
  3. एक और बेहद संवेदनशील और खतरनाक मिशन की चर्चा है—गायब हुए यूरेनियम का पता लगाना। बताया जाता है कि पिछले साल जून में अमेरिका के हवाई हमलों के बाद करीब 440 किलो हाईली एनरिच्ड यूरेनियम का कोई सुराग नहीं मिल पाया था। अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio भी कह चुके हैं कि “आखिर किसी को तो अंदर जाकर इसे वापस लाना ही होगा।” इसका सीधा मतलब है कि अमेरिकी स्पेशल फोर्सेज को ईरान के भीतर घुसकर इन खतरनाक रेडियोएक्टिव पदार्थों की तलाश का जिम्मा दिया जा सकता है।

क्यों अमेरिका अब तक चुप बैठा है?

इतनी बड़ी सैन्य तैयारी और खतरनाक रणनीतियों के बावजूद अमेरिका खुलकर कुछ क्यों नहीं कह रहा? इसकी एक बड़ी वजह यह है कि यह इराक या अफगानिस्तान जैसी स्थिति नहीं है। ईरान से सीधा मुकाबला करना आग में कूदने जैसा जोखिम भरा कदम माना जाता है।

Donald Trump ने हाल ही में पत्रकारों से कहा था, “मैं कहीं कोई सेना नहीं भेज रहा हूं… लेकिन अगर भेजता भी, तो क्या मैं आपको पहले बता देता?” वहीं, Marco Rubio लगातार यह कह रहे हैं कि अमेरिका बिना जमीनी सेना उतारे भी अपने लक्ष्य हासिल कर सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि राष्ट्रपति को ‘हर विकल्प’ देने के लिए सैन्य तैनाती की जा रही है। अमेरिका यह अच्छी तरह समझता है कि हवाई हमले करना एक अलग बात है, लेकिन जमीन पर सैनिक भेजना बिल्कुल अलग और ज्यादा जोखिम भरा कदम होता है। हवाई हमलों से दुश्मन को नुकसान पहुंचाया जा सकता है, लेकिन जैसे ही सैनिक जमीन पर उतरते हैं, उनकी जान सीधी खतरे में आ जाती है।

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